Monday, 22 August 2022

भारत और अमेरिका के रक्षा संबंधी मामलों में अमेरिका का नरम भाव - S-400 के सौदे को मंज़ूरी का समर्थन

 भारत  और  अमेरिका  के  रक्षा  संबंधी   मामलों  में  अमेरिका  का  नरम  भाव - S-400 के  सौदे  को मंज़ूरी का  समर्थन 



हाल  ही  में  जो  बाइडन   प्रशासन  के   बयान  के   अनुसार  अमेरिका , भारत  और  रूस  के  बीच S-400   विकसित   मिसाइल प्रणाली  के  समझौते  को  मंज़ूरी  देने  की  तरफ़  है।


जैसा  की  हम  सभी  जानते  है   कि 2018  में  भारत  और  रूस  के  बीच S-400  का  क़रार  तय  हुआ  था।इस  बात  से  अमेरिका  ने  भारत पर  ‘काउंटरिंग अमेरिकाज एडवर्सरीज थ्रू  सैंक्शन एक्ट’ (Countering America’s Adversaries Through Sanctions Act) (CAATSA) अधिनियम  के  अनुसार  प्रतिबंध लगाया।


CAATSA  के  अंतर्गत अमेरिका  उन  सभी  देशों पर  प्रतिबंध  लगा  सकता  है  , जो  अमेरिका  विरोधी  राष्ट्रों  से  जिन्हें  अमेरिका  अपना विरोधी  मानता  है  जिनमें रूस  ,ईरान, और  नॉर्थ  कोरिया  हैं  उनसे  रक्षा  से जुड़े  सौदों की  पहल करते हैं।



भारत  के  लिए  क्यों  ज़रूरी  है  s-400  और  भारत  का  क्या  है  मत?

S -400  एक वायु रक्षा मिसाइल प्रणाली है ,जो सतह से हवा में मार करने वाली  मिसाइल प्रणाली है . जिसका रडार बहुत अत्याधुनिक और ताकतवर है जो अमेरिका के थाड (THAAD) से कहीं  ज्यादा विकसित है


इसे विमान, क्रूज़ और बैलिस्टिक मिसाइलों और हाइपरसोनिक हथियारों को नष्ट करने के लिए डिज़ाइन किया गया है और इसका उपयोग ज़मीन पर बने इन्स्टॉलेशन पर भी किया जा सकता है.


साल 2018 में भारत ने रूस से पाँच एस-400 मिसाइल सिस्टम ख़रीदने के सौदे पर  हस्ताक्षर  किया  था , जिसकी  पहली  खेप  भारत पहुँच  गयी  है।

 S-400 रूस का बेहद आधुनिक मिसाइल सिस्टम है जो  भारत  के  सैन्य  सुरक्षा   की दृष्टि  के  अनुसार   बहुत  आवश्यक  है  क्योंकि  भारत  का  धुर  विरोधी  चीन  जिसके  पास  आधुनिक  मिसाइल है , वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान और चीन की एकजुटता और भारत के साथ सीमा विवादों को देखते हुए शक्ति संतुलन के लिहाज से ये बहुत उपयोगी और ठोस मिसाइल प्रणाली है


हल में चल रहे लद्दाख सीमा विवाद को मद्दे नजर रखते हुए भारत ने अपनी सुरक्षा के लिए इस उपकरण की खरीद का पुरज़ोर समर्थन किया है .



क्यों  अमेरिका के नज़रिए   में  हुआ बदलाव ?


विश्व  की महाशक्तियों में खुद का हितों को देखर अपनी प्रभुता दिखाने की होड़ लगी है जिसके  तहत  मजबूत सैन्य शक्ति   और कूटनीतिक और राजनतिक प्रयासों से अपनी हितों को साध रही हैं।

 चीन और अमेरिका के बीच शक्ति की प्रतिस्पर्द्धा   लगातार  चल रही है, लेकिन इंडो-पैसिफिक(Indo- Pacific) क्षेत्र में इसकी गूंज जयादा साफ़ सुनाई देती है।

वर्तमान में रूस और यूक्रेन युद्ध से रूस और चीन के  रिश्तों के  बीच में एक नया मोड़ आया है और दोनों देश अपने अपने हितों के लिए एक दूसरे की सहायता कर रहे हैं।

अमेरिका के लिए चीन के साथ प्रशांत महासागर में निपटने के लिए भारत का सहयोग बहुत जरुरी है क्योंकि भारत चीन के बाद एशिया की दूसरी बड़ी सैन्य शक्ति है।

दूसरा  मसला यह है  की  अमेरिका के लिए अफ़ग़ानिस्तान  का मुद्दा भी अहम् है ,जहाँ अब तालिबान सत्ता पर काबिज़ है ,

और अमेरिका आतंकवाद विरोधी गतिविरोधियों को रोकने के लिए अपनी प्रतिबद्धता के लिए प्रयासरत है  ,अतः उसे भारत का सहयोग और समर्थन की जरुरत है जो भारत और अमेरिका के साझे हितों में से महत्वपूर्ण भाग है।



हाल में  ही  दिए गए बयान में अमेरिकी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता नेड प्राइस ने भारत और रूस के पुराने संम्बधों को महत्व देते हुए  कहा  है  कि हर देश की अपनी विदेश नीति है। हमें बस अपना काम करते हुए अपने रिश्तों को मजबूत करना चाहिए जिन देशों से हमारे विचार और दृष्टिकोण मिलते है.


अमेरिका के बदलते और नरम स्वाभाव का कारण भारत का बढ़ता कद और कूटनीतिक और राजीनतिक प्रयासों का मिलाजुला परिणाम है.

इससे भारत की बैकडोर डिप्लोमेसी ने भी अपनी अहम् भूमिका निभाई है .,परंतु सबसे सकारात्मक बात यह है  कि  अमेरिका ने देर से ही सही भारत और रूस के  रक्षा सम्बन्धो को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार कर लिया है ।

इससे पहले टर्की को S-400 मामलो में अमेरिका के कड़े और सख्त रूप का सामना करना पड़ा है ,लेकिन भारत  के प्रति अमेरिका के बदले रुख़ से चीन और  पाकिस्तान थोड़ा हैरत में हो क्योंकि  मौजूदा  हालत  के  भारत में सम्बन्ध रूस  और अमेरिका दोनों से से मजबूत है ,और इसके साथ ही भारत अपने ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल को  और उन्नत  तरीक़े  से  विकसित कर सकता है रूस की जिरकान हाइपरसोनिक मिसाइल के  तकनीकी  के आधार पर।


अमेरिका का यह क़दम भारत और  अमेरिका के  संबंधो  को एक नया दिशा देगा जो दोनो  देशों के  लिए प्रभावकारी  होगा।


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