किवाड़ पर टंगा दीया
किसी किवाड़ पर दिया टंगा था
किवाड़ खोलो तो दिन की रोशनी में दीया का अस्तित्व ख़त्म
किवाड़ बंद तो दीया का कुछ प्रभाव है ।
क्या किवाड़ के खुलने और बंद होने पर दीया निर्भर था?
क्या बड़ी रोशनी के सामने उसका महत्व नहीं?
पर इसके दो अर्थ हो सकते हैं।
भला वो क्या?
पहला तो ये बड़ी चीज़ों के सामने अक्सर छोटी काया की वस्तु गुम सी जाती है
दूजा ये कि शायद दीया अंतर्मुखी हो
वह किवाड़ बंद होने के बाद अपना जौहर दिखाता हो।
शायद जब किवाड़ खुलती है तो तो वह बाहरी समाज से खुलकर मिल ना पता हो
लेकिन किवाड़ बंद होते ही पूरी कमरे की चीज़ें उसकी दोस्त और हमसफ़र ।
पर वो जानता है कि रात में उसकी असली शक्ति आती है
जहाँ बाहर और भीतर समान।
पर क्या ये समानता समय की गिरवी है
जैसे समय ने इसे ज़ंजीरो से बाँध दिया हो
पैरों को अवरुद्ध कर दिया है
क्या समानता हर समय नहीं रह सकती।
समय का जाल उस पर हावी है
पर इसका उपाय क्या
कही वो उद्यम तो नहीं
शायद यही है
पर दीया तो दिन में भी उद्यम कर रहा है पर दिन में उसका मोल नहीं
रात में उसका मोल है
किवाड़ तो बस एक माध्यम है बाहर और अंदर की दुनिया की सूत्र धार
पर दीया तो टंगा है किवाड़ पर।
उसे उतारकर चलना होगा अपने पैरों पर
और जितनी भी रोशनी होगी सही जगह पर दिखानी होगी।
शायद कहीं बादलों ने दिन में भी अंधकार को ढक रखा होगा।
तब दिया अपनी महता को समझेगा की
मेरे प्रकाश की लौ समय की मोहताज नहीं।
मुझे ख़ुद अपना रास्ता और पथ चुनना होगा ,
हवाओं से लड़ना होगा,बारिशों में भीगना होगा
फिर भी हर हाल में मुझे जलना होगा।
क्योंकि मेरी यात्रा और दीयों को नयी रोशनी देगा
जिन्हें कोई कुम्हार गढ़ रहा होगा अपने साँचे में।
No comments:
Post a Comment