ध्यान से पुरुषार्थ तक का सफ़र
ध्यान का विषय आजकल बड़ा प्रचलन में है जिसे अंग्रेज़ी में हम meditation कहते है।इसकी उपयोगिता मानव इतिहास के विकास की धुरी है।
ध्यान सृष्टि के सृजन और अंत तक चलने वाली निरंतर प्रक्रिया है जो मनुष्य के अंदर रोज़ घटित हो रही है पर अक्सर हम ध्यान को केंद्रित नहीं कर पाते।ध्यान तो चेतन होकर आसपास होने वाली सूक्ष्म परिवर्तनो को साक्षी भाव और सहज भाव से देखने की प्रक्रिया है
यह अपने अंदर झाँकने का सरलतम माध्यम है।ध्यान के कई रूप और प्रकार है।मनुष्य अपनी विषय वस्तु और इच्छानुसार अपना ध्यान केंद्रित कर सकता हाई चाहे वह बाह्य जगत हो या अंतर्मन की यात्रा।
जैसे एक माँ अपने शिशु के जन्म से उसकी हर गतिविधि या ज़रूरतों पर ध्यान देती है जैसे उसकी हर स्वाँस अपने शिशु का ही चिंतन कर रही हैआपका उद्देश्य निर्धारित करता है की आपका ध्यान कहाँ केंद्रित है।
ध्यान का महत्व
ध्यान महत्त्वपूर्णता की दृष्टि से मानव जीवन का अभिन्न अंग है ।ध्यान से मनुष्य की चेतना का विकास होता है।वह स्वयं के व्यक्तित्व का इस प्रकार विकास करता है जैसे कुम्हार बड़ी तन्मयता से किसी घड़े का निर्माण।
ध्यान तो समाधि और परमानंद तक पहुँचने की सीढ़ी है है जिसके सहारे मनुष्य अपने विकास के साथ साथ मानव कल्याण और हित के लिए अपने पुरुषार्थ द्वारा ख़ुद को इस प्रकार रूपांतरित कर देता है ,जिससे वह शायद इस अवस्था में पहुँच जाता है जहाँ वह अहं ब्रमहास्मि के कथन को सार्थक कर दे।
ध्यान की ख़ासियत
ध्यान हर पल हर क्षण घटने वाली घटना है।बस ज़रूरत है जागरुक होने की।ध्यान एक गहराई है जहाँ असंख्य विचार रूपी तरंगे उठती है और समुद्र रूपी मन के सतह पर आकर ध्यान के माध्यम से विलुप्त हो जाती है.ध्यान विचारों को सहज भाव से देखने की प्रक्रिया के साथ स्वयं को जानने और मोक्ष को प्राप्त करने का सर्वश्रेष्ठ माध्यम है।
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