शादी की उम्र में समानता (अभिलाषाओं को नयी उड़ान)
पुरुष और स्त्री पंछी के दो पंख की तरह होते है यदि एक पंख ना रहे या थोड़ा कमज़ोर हो तो शायद उड़ान बाधित होगी।उसी तरह पुरुष और स्त्री को समान अवसर भी ज़रूरी है जिसमें शादी की उम्र सूत्रधार का काम करेगी
हाल में ही सरकार ने लड़कियों की शादी की उम्र को 18साल से 21 साल उनको लड़कों की शादी युक्त आयु के समकक्ष खड़ा कर दिया है। हालाँकि इस दिशा में पहले भी कुछ प्रयास हुए है जिनमे में शारदा ऐक्ट 1929एक अच्छी पहल थी।यह ज़ाहिर तौर पर एक सराहनीय क़दम है जो देश की दिशा को निर्धारित करने में अहम भूमिका निभाएगा।
हमारे देश में पहले अधिकांशतः परिवारों में लड़कियों पैदा होते ही वे एक ज़िम्मेदारी के तौर पर देखी जाती थी या गृहस्थी के कामों के लिए एक कुशल या भावी सैनिक या यूँ कहे तो उनका भविष्य पूर्वनिर्धारित रहता था बस अंतर होता आर्थिक रूप रेखा की किस घर में उनकी शादी होगी जो सम्पन्न और समृद्ध हो।उन्हें अपनी स्वेच्छा से अपना कार्यक्षेत्र चुनने की आज़ादी बिल्कुल नहीं होती थी।
उनकी बौधिक क्षमता या तार्किक क्षमता का विषय कुछ सीमित दायरों में सिमट जाता था बस वो रात को खुले आसमान को निहारकर अपने सपनो के ताने बाने बुन लेती थी।उम्र बढ़ने के साथ उनको अपने निर्धारित रोल में फ़िट कर दिया जाता था जैसे कोई फ़िल्म की स्क्रिप्ट हो पर अब नया दौर नया क़दम जो लड़कियों के लिए संबल है ।
ये पहल उनकी आकांक्षाओं को एक नयी उड़ान देगा जिसमें पहली यात्रा उनकी शिक्षा से शुरू होगी।
वर्तमान में राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) की डेटा के अनुसार भारत की औसत साक्षरता दर 77.07 है, जहाँ पुरुषों की साक्षरता 84.70 है ,वही दूसरी तरफ़ महिलायों की की 70.30 है।इस असमानता का मूल कारण है की कम उम्र में लड़कियों की शादी जो उनकी शिक्षा की यात्रा करने वाले पंख कुतर देती है ।
इस पहल का दूसरा प्रभाव उनके स्वास्थ्य से जुड़ा है हम जानते है कि शिक्षा जागरूकता का पहला चरण है जैसे ही लड़कियाँ शिक्षित होंगी और शादी की तय उम्र जो 21 साल निर्धारित की है तब तक वो अपनी स्वस्थ्य से जुड़ी बातों से चिर परिचित और जागरूक हो जायेंगी जिसके दो तात्कालिक प्रभाव दिखेंगे।पहला यह है की परिवार नियोजन में उनकी भूमिका अहम होगी जो भारत की बढ़ती जनसंख्या को नियंत्रित करने में एक महत्वपूर्ण कारक साबित होगा वही दूसरी तरफ़ शिशु जन्म के समय होने वाली मातृ-मृत्यु दर में कमी आएगी जो अभी फ़िलहाल में 113 प्रति 100,000है,जबकि यूनाइटेड नेशन के सतत विकास सूचकांक -3 (SDG3) के अनुसार 2030तक इसे70 प्रति 100,000लाना है।
ये सभी चीज़ें एक दूसरे की पूरक तभी साबित होंगी जब लड़कियों को समान अवसर मिले और वे खुले पंखो से उड़ान भरे अपनी पूरी ताक़त से और वो उड़ान ऊँची और गगनचुंबी हो जिससे राष्ट्र गौरान्वित हो।
क्योंकि लड़कियाँ भविष्य की जननी है।यदि वे शिक्षित,समर्थ और स्वतन्त्र रहेंगी तो वे अपनी आनी वाली पीढ़ी को उसकी उड़ान में मदद करेंगी विशेषतः लड़कियों को।
इससे देश सशक्त बनेगा और भावी पीढ़ी की आधारशिला मज़बूत होगी बस इस बात का ध्यान रखना है कि सामंजस्य की डोर हमेशा बनी रहे जिसमें शादी एक अहम भूमिका निभाता है जब दो जागरूक और समर्थ लोग अपने हित के साथ राष्ट्रहित में मिलकर कार्य करते है तब वो राष्ट्र हमेशा विश्वपटल पर एक सशक्त स्तम्भ की तरह खड़ा रहता है।
No comments:
Post a Comment