Friday, 31 December 2021

ध्यान से पुरुषार्थ तक का सफ़र

 ध्यान से पुरुषार्थ तक का सफ़र

ध्यान का विषय आजकल बड़ा प्रचलन में है जिसे अंग्रेज़ी में हम meditation कहते है।इसकी उपयोगिता मानव इतिहास के विकास की धुरी है।

ध्यान सृष्टि के सृजन और अंत तक चलने वाली निरंतर प्रक्रिया है जो मनुष्य के अंदर रोज़ घटित हो रही है पर अक्सर हम ध्यान को केंद्रित नहीं कर पाते।ध्यान तो चेतन होकर आसपास होने वाली सूक्ष्म परिवर्तनो को साक्षी भाव और सहज भाव से देखने की प्रक्रिया है

यह अपने अंदर झाँकने का सरलतम माध्यम है।ध्यान के कई रूप और प्रकार है।मनुष्य अपनी विषय वस्तु और इच्छानुसार अपना ध्यान केंद्रित कर सकता हाई चाहे वह बाह्य जगत हो या अंतर्मन की यात्रा।

जैसे एक माँ अपने शिशु के जन्म से उसकी हर गतिविधि या ज़रूरतों पर ध्यान देती है जैसे उसकी हर स्वाँस अपने शिशु का ही चिंतन कर रही हैआपका उद्देश्य निर्धारित करता है की आपका ध्यान कहाँ केंद्रित है।

ध्यान का महत्व

ध्यान महत्त्वपूर्णता की दृष्टि से मानव जीवन का अभिन्न अंग है ।ध्यान से मनुष्य की चेतना का विकास होता है।वह स्वयं के व्यक्तित्व का इस प्रकार विकास करता है जैसे कुम्हार बड़ी तन्मयता से किसी घड़े का निर्माण।

ध्यान तो समाधि और परमानंद तक पहुँचने की सीढ़ी है है जिसके सहारे मनुष्य अपने विकास के साथ साथ मानव कल्याण और हित के लिए अपने पुरुषार्थ द्वारा ख़ुद को इस प्रकार रूपांतरित कर देता है ,जिससे वह शायद इस अवस्था में पहुँच जाता है जहाँ वह अहं ब्रमहास्मि के कथन को सार्थक कर दे।

ध्यान की ख़ासियत

ध्यान हर पल हर क्षण घटने वाली घटना है।बस ज़रूरत है जागरुक होने की।ध्यान एक गहराई है जहाँ असंख्य विचार रूपी तरंगे उठती है और समुद्र रूपी मन के सतह पर आकर ध्यान के माध्यम से विलुप्त हो जाती है.ध्यान विचारों को सहज भाव से देखने की प्रक्रिया के साथ स्वयं को जानने और मोक्ष को प्राप्त करने का सर्वश्रेष्ठ माध्यम है।


 भारत के अहसास भारत के किसान

अक्सर जब भारत की बात होती है तो किसानो का ज़िक्र ज़रूर होता है।भारतीय कृषि जहाँ भारत की अर्थव्वस्था की धुरी है तो भारत के किसान इसके ध्वजा वाहक।बिना इनके भारत की अर्थव्यस्था की कल्पना तो एक बस सपने जैसा है ।सहस्त्रो सालों से चली आ रही कृषि विरासत को उसके उसी रूप में संजो के रखने का काम भारतीय किसानों ने बख़ूबी किया है लेकिन २१ सदी में नज़ारा कुछ अलग है ,भारत शायद पहले जैसा भारत नहीं रहा ऐसा मुझे लगता है क्योंकि अक्सर जब भी मै अपने गाँव से रूबरू होता हूँ ,तो मुझे वो खेती या किसानी को लेकर उत्साह नज़र नहीं आता।किसान बस खेती कर रहा है जीवन यापन के लिए इसका कारण ये भी है ग्रामीण अंचल में बहुत से लोगों के पास वो ज़रूरी कुशलता या योग्यता नहीं है जो शहरी अर्थव्यवस्था को चाहिए लेकिन इसके साथ दूसरा कारण भी जुड़ा जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसानों को और युवा वर्ग को खेती से दूर कर रहा है वो खेती में अनिश्चितता और सामाजिक ढाँचे में गिरता इसका मान और स्वाभिमान।

अक्सर हम ग्रीन रेवलूशन (green revolution) की बात करते है कृषि उत्पादन में बढ़ोतरी को लेकर, पर क्या ग्रीन रेवलूशन कृषि को सामाजिक (सोशल) पिरमिड में ऊपर या सामान स्थान देने में सक्षम हो पाया या युवा वर्ग को उत्साहित कर पाया है कि वे स्वेच्छा से कृषि को चुने और वैज्ञानिक और प्राकृतिक पद्धतियों के समन्वय से अपना कार्य क्षेत्र कृषि को चुने।कृषि भारत निर्माण में तभी अपनी भूमिका दर्ज कर पाएगा जब युवा इसको मजबूरी नहीं बल्कि रोज़गार का सृजन करने वाला कार्यक्षेत्र मानकर अपनी ऊर्जा शक्ति को उच्चतम तकनीकी के सही प्रयोग से कृषि क्षेत्र में लगाए जिससे कृषि आत्मनिर्भरता के साथ देश की अर्थव्यवस्था के दूसरे कारकों जैसे औद्योगिग क्षेत्रों में अपना योगदान दे।


यह  सवाल  हम  सभी  के  मन  मस्तिष्क  में  होगा जो  कृषि  कार्य  क्षेत्र  से  जुड़े  है,लेकिन  इसका  समाधान भी  हम  सभी  को ढूँढना होगा।मेरा  सोचना  यह  है  कि किसान  जब  ख़ुद  को   तकनीकी  से  जोड़ेगा  तो  वो  सशक्त  और  आत्मनिर्भर के साथ  समृद्ध  भी  होगा और  विश्व  पटल  पर  भारत  अपनी  पहचान  एक  आत्मनिर्भर  भारत  के  रूप  में  रखेगा।

यदि कृषि उत्पाद हमारे पौष्टिक और पर्याप्त हुए तो हमारी वर्तमान बौधिक क्षमता और युवा कार्य बल ऊर्जावान और स्वस्थ होगा।क्योंकि कृषि पोषण का आधार है यदि ये विस्तृत रूप से सुदृढ़ और सतत्  विकास के माप दंडो के हिसाब से क्रियान्वित हो,तभी  कृषि भारत के हरेक क्षेत्र में प्रगति की आधारशिला होगी चाहे वो औद्योगिग ,वैज्ञानिक या आर्थिक या सामाजिक रूप से महत्वपूर्ण कोई भी विषय हो।

अतः भारत के अहसास किसानों  को महसूस करिए और अपना क़दम कृषि को ओर बढ़ाए और भारतीय कृषि को नवीनतम ऊँचाइयों पर ले जाए।।

 शादी की उम्र में समानता (अभिलाषाओं को नयी उड़ान)

पुरुष और स्त्री पंछी के दो पंख की तरह होते है यदि एक पंख ना रहे या थोड़ा कमज़ोर हो तो शायद उड़ान बाधित होगी।उसी तरह पुरुष और स्त्री को समान अवसर भी ज़रूरी है जिसमें शादी की उम्र सूत्रधार का काम करेगी

हाल में ही सरकार ने लड़कियों की शादी की उम्र को 18साल से 21 साल उनको लड़कों की शादी युक्त आयु के समकक्ष खड़ा कर दिया है। हालाँकि इस दिशा में पहले भी कुछ प्रयास हुए है जिनमे में शारदा ऐक्ट 1929एक अच्छी पहल थी।यह ज़ाहिर तौर पर एक सराहनीय क़दम है जो देश की दिशा को निर्धारित करने में अहम भूमिका निभाएगा।

हमारे देश में पहले अधिकांशतः परिवारों में लड़कियों पैदा होते ही वे एक ज़िम्मेदारी के तौर पर देखी जाती थी या गृहस्थी के कामों के लिए एक कुशल या भावी सैनिक या यूँ कहे तो उनका भविष्य पूर्वनिर्धारित रहता था बस अंतर होता आर्थिक रूप रेखा की किस घर में उनकी शादी होगी जो सम्पन्न और समृद्ध हो।उन्हें अपनी स्वेच्छा से अपना कार्यक्षेत्र चुनने की आज़ादी बिल्कुल नहीं होती थी।

उनकी बौधिक क्षमता या तार्किक क्षमता का विषय कुछ सीमित दायरों में सिमट जाता था बस वो रात को खुले आसमान को निहारकर अपने सपनो के ताने बाने बुन लेती थी।उम्र बढ़ने के साथ उनको अपने निर्धारित रोल में फ़िट कर दिया जाता था जैसे कोई फ़िल्म की स्क्रिप्ट हो पर अब नया दौर नया क़दम जो लड़कियों के लिए संबल है ।

ये पहल उनकी आकांक्षाओं को एक नयी उड़ान देगा जिसमें पहली यात्रा उनकी शिक्षा से शुरू होगी।

वर्तमान में राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) की डेटा के अनुसार भारत की औसत साक्षरता दर 77.07 है, जहाँ पुरुषों की साक्षरता 84.70 है ,वही दूसरी तरफ़ महिलायों की की 70.30 है।इस असमानता का मूल कारण है की कम उम्र में लड़कियों की शादी जो उनकी शिक्षा की यात्रा करने वाले पंख कुतर देती है ।

इस पहल का दूसरा प्रभाव उनके स्वास्थ्य से जुड़ा है हम जानते है कि शिक्षा जागरूकता का पहला चरण है जैसे ही लड़कियाँ शिक्षित होंगी और शादी की तय उम्र जो 21 साल निर्धारित की है तब तक वो अपनी स्वस्थ्य से जुड़ी बातों से चिर परिचित और जागरूक हो जायेंगी जिसके दो तात्कालिक प्रभाव दिखेंगे।पहला यह है की परिवार नियोजन में उनकी भूमिका अहम होगी जो भारत की बढ़ती जनसंख्या को नियंत्रित करने में एक महत्वपूर्ण कारक साबित होगा वही दूसरी तरफ़ शिशु जन्म के समय होने वाली मातृ-मृत्यु दर में कमी आएगी जो अभी फ़िलहाल में 113 प्रति 100,000है,जबकि यूनाइटेड नेशन के सतत विकास सूचकांक -3 (SDG3) के अनुसार 2030तक इसे70 प्रति 100,000लाना है।

ये सभी चीज़ें एक दूसरे की पूरक तभी साबित होंगी जब लड़कियों को समान अवसर मिले और वे खुले पंखो से उड़ान भरे अपनी पूरी ताक़त से और वो उड़ान ऊँची और गगनचुंबी हो जिससे राष्ट्र गौरान्वित हो।

क्योंकि लड़कियाँ भविष्य की जननी है।यदि वे शिक्षित,समर्थ और स्वतन्त्र रहेंगी तो वे अपनी आनी वाली पीढ़ी को उसकी उड़ान में मदद करेंगी विशेषतः लड़कियों को।

इससे देश सशक्त बनेगा और भावी पीढ़ी की आधारशिला मज़बूत होगी बस इस बात का ध्यान रखना है कि सामंजस्य की डोर हमेशा बनी रहे जिसमें शादी एक अहम भूमिका निभाता है जब दो जागरूक और समर्थ लोग अपने हित के साथ राष्ट्रहित में मिलकर कार्य करते है तब वो राष्ट्र हमेशा विश्वपटल पर एक सशक्त स्तम्भ की तरह खड़ा रहता है।