Monday, 21 November 2022

धूल के अंधड़

 अंधड़ है बहुत

कुछ धूल से भरे, 

कुछ आधे यूँ पड़े, 

हवा की मार से सब औंधे मुँह पड़े.

क्या डर से स्तब्ध है, 

या मौन ही प्रारब्ध है, 

ये भला क्या प्रकोप है, क्यों सब के सब निःशब्द है, 

तकतों की दुनिया में, 

क्यों है सब मूक बनके यहाँ, 

किस चीज की आहट से, 

भला जागती है दुनिया, 

डर का कैसा ये अंतर्जाल है, 

फैला कैसा ये तिमिर जाल है, 


प्रकाश पुंज की प्रतीक्षा है सभी को, 

पर नसों में धधकती क्यों नहीं अंगार है, 


रथ पर आरूढ़ हो, 

सारथी या रथी बनो, 

आरुण्य की लालिमा से, 

तिलक कर आगे बढ़ो, 

पथ तुम्हारा खुल जायेगा, 

धूल से भरा अंधड़ स्वयं ही हट जायेगा.. 



By. 


अभिषेक राय

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