Monday, 21 November 2022

धूल के अंधड़

 अंधड़ है बहुत

कुछ धूल से भरे, 

कुछ आधे यूँ पड़े, 

हवा की मार से सब औंधे मुँह पड़े.

क्या डर से स्तब्ध है, 

या मौन ही प्रारब्ध है, 

ये भला क्या प्रकोप है, क्यों सब के सब निःशब्द है, 

तकतों की दुनिया में, 

क्यों है सब मूक बनके यहाँ, 

किस चीज की आहट से, 

भला जागती है दुनिया, 

डर का कैसा ये अंतर्जाल है, 

फैला कैसा ये तिमिर जाल है, 


प्रकाश पुंज की प्रतीक्षा है सभी को, 

पर नसों में धधकती क्यों नहीं अंगार है, 


रथ पर आरूढ़ हो, 

सारथी या रथी बनो, 

आरुण्य की लालिमा से, 

तिलक कर आगे बढ़ो, 

पथ तुम्हारा खुल जायेगा, 

धूल से भरा अंधड़ स्वयं ही हट जायेगा.. 



By. 


अभिषेक राय

Saturday, 12 November 2022

 

सोच में हाज़िर

आकाश में घना कोहरा है,
कुछ अजीब बात है ना,
ठंड भी नहीं है,
पर ये कोहरा है,
सड़क पर भीड़ खड़ी है,
बेवजह,
किसी ने पूछा क्यों क्या हुआ?
पर, कोई कुछ बोलता नहीं,
सभी बुत की तरह खड़े हैं,

तभी एक छोटा सा लड़का बोलता है,
डरे है सब, किसी अनजान खतरे से,
कोई अपने अतीत से, तो कोई अपने भविष्य से,
इनकी सोच में कोई हाज़िर हो गया है,
जिसका तिलिस्म ये तोड़ नहीं पा  रहे है,
बस कोई सकारात्मक  सोच, जो हाज़िर हुई सोच से लड़ सके तभी कुछ होगा,
नहीं तो,
ये हाज़िर हुई सोच इनके रूह को खत्म कर देगी,
सोच और विचारों का द्वंद् तो सदियों से चला आ रहा है,
जीता वही जो परिवर्तन के साथ रहा,
सुदृढ़ रहा, निर्भय रहा,
और मन के दरवाजे कैद करने वाली सोच के लिए बंद,
और मुक्त करने वाली सोच के लिए खोल दिये,
जैसे आकाश बाहें फैलाये वर्षा को अपनाता है,
और घने कोहरे को हटाता है.

                  By. अभिषेक राय

https://youtu.be/-sUn9TpFFsw