आज़ादी के नए मायने -एक दृष्टिकोण
भारत वर्ष हमेशा अंतर्मन से स्वतंत्र रहा है।चाहे जो भी कालखंड हो, जिसमें बाहरी आक्रांताओ ने भले ही भारत के भूखंड पर अपना क़ब्ज़ा किया लेकिन भारत का मन जो उसके धर्म में निहित है उसको कुचल नहीं पायी।चाहे वो बाहर से आए हमलावर हो या अंग्रेज़ो का साम्राज्य।हमारी सांस्कृतिक विरासत का वो दमन नहीं कर पाए।हर एक कालखंड में भारत के युग पुरुषों ने अपने धर्म का पालन किया जो राष्ट्र और समाज के लिए उपयुक्त था।आज़ादी का मतलब केवल स्वेक्षा से बाहर घूमना ही नहीं होता।आज़ादी एक व्यापक विषय है इसका इतना संकीर्ण और सीमित दायरा नहीं होता।
हम सभी अपने गौरवशाली इतिहास से भलीभाँति चिर परिचित होंगे क्योंकि भारतवर्ष और इसका धर्म सनातन है जिसका मुख्य उद्देश्य मानव जीवन के उत्थान में है ।इसलिए यहाँ पर समय समय पर अनेक महापुरुषों ने अपने धर्म का पालन कर निःस्वार्थ भाव से अपने जीवन में अपने धर्म का पालन किया और भारत में व्याप्त बुराइयों का खंडन किया और राष्ट्र को एकजुट कर मानव को उसके धर्म और कर्म के लिए प्रेरित किया ।जिससे राष्ट्र प्रगतिशील रहे और इतना सशक्त रहे कि कभी किसी बाहरी आक्रांता का ग़ुलाम ना रहे।
ये तो एक पृष्ठभूमि थी जो हमें दिशा निर्देशित करती रहेगी । सन 1947 की स्वतंत्रता के बाद भारत के लोगों को आज़ादी मिली जहाँ लाखों लोगों का निःस्वार्थ बलिदान संचित है।लेकिन सभी प्रकार की आज़ादी के बाद अभी भी भारत को आज़ादी पूरी तरह से नहीं मिली।भूख,बेरोज़गारी,प्रदूषणजिसमें जल और हवा प्रमुख है ,नारी का सशक्तिकरण जैसी अनगिनत समस्याएँ है जो आज़ादी के मायने को ग्रहण लगाती है।
हालाँकि स्वतंत्रता के बाद भारतवर्ष ने काफ़ी प्रगति की है पर 21सदी का भारत कुछ और चाहता है ,जैसे ,कोरोना काल में हुई परेशानियों से सभी ने सामना किया; जिससे ये पता चला की अभी हम उतने सशक्त नहीं हुए है कि विपरीत परिस्थितयों में अपने नागरिकों की रक्षा कर पाए.
हालाँकि मौजूदा सरकार ने अपना प्रयास काफ़ी किया पर अब भी जो कमियां रही उसका पुनःमूल्याँकन करे और सभी पार्टियों में कुछ विषयों को लेकर सामंजस्य हो जो राष्ट्र हित और जनहित में हो।
मेरा मानना यह है कि हमें हमें हमेशा आशावादी होना चाहिए पर आशावादी होने के साथ साथ हमें अपनी ज़मीनी हालातों का निरीक्षण कर अपने द्वारा किए गए प्रयासों का अवलोकन करना चाहिए।ये काम हमारी केंद्र और राज्य सरकारों को सोचना चाहिए की सरकारें आएँगी फिर कुछ साल बाद कोई नयी पार्टी आएगी सत्ता में।
यह कथन हमारे भूतपूर्व प्रधान मंत्री “अटल बिहारी जी “ने एक बार अपने संसदीय भाषण में ये कहा था कि ये सत्ता का आना जाना लगा रहेगा लेकिन एक राष्ट्र की परिकल्पना जो ,स्वामी विवेकानंद, महर्षि अरबिंदो,सरदार पटेल, महात्मा गांधी और नेताजी सुभाष चंद्रा बोस ने की थी वो जीवंत रहना चाहिए।जिससे देश हर दृष्टिकोण से सशक्त होना चाहिए चाहे वह धार्मिक,आर्थिक सामाजिक,और सांस्कृतिक क्षेत्र हो इन सभी में विश्व पटल पर भारत एक उदाहरण के तौर पर देखा जाए जैसे आध्यात्म की गंगा भारत से निकलती है वैसे ही हम हर क्षेत्र में प्रगतिशील रहे, इसलिए इसमें एक प्रगतिशील राजनीति ज़रूरी है। जिसका लक्ष्य राष्ट्र और लोकतंत्र को जीवंत बनाए रखने में होना चाहिए क्योंकि ,भारत के लोगों के सम्पूर्ण विकास के बिना ये लक्ष्य पूरा नहीं हो सकता,अतः उन्हें ज़रूरी चिकित्सा की सुविधा,शुद्ध जल और हवा मिले तभी मेरी नज़रों में आज़ादी है , क्योंकि कोरोना ने सभी लोगों को घरों में रहने पर विवश कर के ये तो सिखा दिया की असली आज़ादी क्या होती है इसलिए मेरी नज़रों में आज़ादी अभी अधूरी है।हम सभी को जागरूक होकर केंद्र और राज्य सरकारों के साथ मिलकर और चुने हुए प्रतिनिधियो के सहयोग से अपने देश के विश्वगुरु के सपने को साकार करना है और ये तभी सम्भव है जब हम आज़ादी को एक बहुव्यापि ढंग से सोचे और हर क्षेत्र में सशक्त रहे।